Sunday, 22 September 2013

चाणक्य जी ने बताया कि किस नीति के बिना राजतन्त्र अधूरा है .

1-      स्वराष्ट्र सम्बन्धी,परराष्ट्र सम्बन्धी कर्तव्य अपनी राष्ट्र व्यवस्था के अंग होते हैं |



  भावार्थ- परराष्ट्र की नीति के बिना राजतन्त्र अधुरा है |परराष्ट्र का सुद्रढ़ होना अत्यावश्यक है |इसके विना कोई भी राष्ट्र सुद्रढ़ नहीं रह सकता है |स्वराष्ट्र सम्बन्धी तथा परराष्ट्र से व्यवहार विनमय सम्बन्धी दोनों प्रकार के कर्तव्य राजतन्त्र में सम्मिलित होते हैं |अर्थात उसके भले-बुरे के अनुसार भले-बुरे होते हैं |परराष्ट्र चिन्ता के बिना राजतन्त्र अधूरा रहता है |तंत्र अर्थात स्वराष्ट्र अर्थात अपनी प्रजा के जीवन साधनों की रक्षा तथा आवाम नाम से प्रसिद्द परराष्ट्र चिन्ता या उससे व्यवहार ये दोनों बातें राज्य-व्यवस्था की इतिकर्तव्यता में सम्मिलित हैं |

चाणक्य जी ने बताया कि राष्ट्र कैसे नीतिपरायण रह सकता है .

1-      समाज में प्रचलित या व्यव्ह्त नीतिशास्त्र ,राज्य-व्यवस्था की नीति के अधीन होता है |



    भावार्थ- राष्ट्र तब ही नीतिपरायण रह सकता है ,जब उसका राजतन्त्र नीतियुक्त हो |यदि राजतन्त्र में नीति का प्रयोग न हो तो लोक में नीति नाम की कोई वस्तु नहीं रहती |नीति राजतन्त्र में सीमित और राजतन्त्र से ही सुरिक्षित रहती है |राजतन्त्र मनुष्य समाज के साथ-साथ चलता है |नीतिमत्ता मानव समाज की विशेषता है |राज्यव्यवस्था नीतिसम्पन्न हो तो समाज में नीति का जन्म देने तथा फलने-फूलने का अवसर मिल जाता है |राज्यसंस्था के नीतिसम्पन्न होने पर ही देश में नीति कायम रहती है |राजतन्त्र को न मानने या भंग करने वाला नीतिहीन कहलाता है |समाज से बहार चले जाना या समाज को अस्वीकार कर देना ही नीतिहीनता है |राजतन्त्र ने ही नीति को जन्म दिया है |पहले समाज बना फिर नीति बनी | 

Saturday, 21 September 2013

चाणक्य जी ने बताया कि राजतन्त्र के लिए अतिआवश्यक चार बातें कौन सी बतायी.

1-      लक्ष्य की राजा ,राज्यकर्मचारियों की उचित नियुक्ति ,रक्षित का वर्धन ,अलक्ष्य का लाभ ,राजकाज में विनियोग और व्यय –यह चार बातें राजतन्त्र के लिए आवश्यक हैं |



  भावार्थ- इन्हीं चार बातों पर राज्य निर्भर होते हैं |राज्य की चार यही मुख्य समस्यायें होती हैं |राज्य अधिकारी लोग न तो अर्थवृद्दि में प्रमाद करें ,न राज्यश्री का असद्व्यय करें और न उसे अनुपयोग से नष्ट होने दें |श्री की दान भोग तथा नाश से चोथी गति नहीं है |राजा लोग सामादि उपायों से ,फूल में से अति क्षुद्र मात्रा में रस लेते ,फिर मधुकारों के समान सुसह्य उपायों से प्रजा से धन संग्रह करें |

चाणक्य जी ने नीच किसको बताया.

1   तत्वदर्शी विद्धानों के द्धारा कहा गया है की सहस्त्र चाण्डालों के समान एक यवन ही होता है ,यवन से बढ़कर दूसरा कोई नीच नहीं है |

चाणक्य जी ने बताया कि धन किन लोगों को देना चाहिए .

1-  हे बुद्दिमान ! गुणों से युक्त मनुष्यों को धन दो ,ओरों को , गुणहीनों को ,कभी मत दो |समुद्र का जल मेघ ,बादल के मुख में प्राप्त होकर सदा माधुर्य से युक्त हो जाता है और भूमण्डल पर स्थित सभी जड़ और चेतन ,अचर और चर जीवों को जीवन देकर फिर उसी जल को कोटि गुना होकर समुद्र में जाता हुआ देखो |

Friday, 20 September 2013

चाणक्य जी ने बताया कि मनुष्य का घरेलू महाशत्रु कौन होता है .

1-      अप्राप्त राज्येश्वर्य का निरन्तर संग्रह करते चले जाना प्रयत्नहीन शक्ति मंद आलसी का काम नहीं है |


     भावार्थ- दैव यदि आलसी को कुछ दे भी दे तो उससे उसके द्रव्य की रक्षा भी नहीं होती है |मनुष्य में सत्यनिष्ठा न होना ही आलस्य है |सत्यहीन व्यक्ति न करने योग्य काम करता है तथा योग्य सत्यानुमोदित प्रयत्नों में आलस्य करता है |अकर्त्तव्य अर्थात न योग्य काम करना तथा कर्त्तव्यों अर्थात करने योग्य कामों से बचते रहना ही आलस्य है |आलस्य मनुष्य के शरीर के ही शरीर में रहने वाला मनुष्य का घरेलू महाशत्रु है |कार्यों से बचना ही आलस्य होता है |


2-       आलस सत्यहीन ,प्रयत्नहीन व्यक्ति का दैववश संचित राजेश्वर्य कुछ काल तक सुरिक्षित दिखने पर भी उसके बुद्दिमान्ध से वृद्दि को प्राप्त नहीं होता है |


 भावार्थ- राजेश्वर्य वृद्दि न होना ही अनिवार्य विनाश है |आलस्य देहस्थ अन्तः शत्रु है |इसलिए मानव आलस्यरूपी दोष को सदा त्याग करता रहे |अनलस की लब्ध की रक्षा कर पाता है और इस कारण वृद्दि अवश्य होती है |आलस के कारण आलसी व्यक्ति राजेश्वर्य की वृद्दि नहीं कर पाता है |अतः व्यक्ति को सदा अपने आलस को त्याग करते रहना चाहिए |यदि वह येसा नहीं करता है तो उसके राजेश्वर्य में वृद्दि न होकर बिनाश अनिवार्य होता है |


3-      आलस सत्यहीन ,प्रयत्नहीन ,योगसक्त राजा या राज्याधिकारी राजकीय कर्मचारियों को काम या उचित सेवा में लगानें तथा उनसे उचित सेवा लेने प्रमाद कर बैठते हैं |



 भावार्थ- राज या राज्याधिकारीगण जब स्वयं आलस्यवश कार्य न कर अपने नौकरों से काम लेते हैं तो फिर सर्वनाश का श्रीगणेश होने लगता है |यह एक भयंकर अपराध है |येसे लोगों के कारण तब राज्य-व्यवस्था भंग होने लगती हैं |काम करने से बचना जिसका स्वभाव हो जाता है ,वः भ्रत्यों से काम लेने रूपी कर्म से भी स्वभाव से बचता है |यही उसके आलस्य का स्वरूप है |आलस्य न त्यागना ,भ्रत्यों से यथोचित काम न लेना ,राजा की राज्यव्यवस्था को अव्यवस्थित कर देने रूपी भयंकर अपराध है |

चाणक्य जी ने बताया कि किस प्रकार के मित्र मिलने से शक्ति का संग्रह होता है .

1-      सच्चे मित्रों के मिलने या संग्रह करने से ही व्यक्ति को बल प्राप्त होता है |


  भावार्थ-  सच्चे मित्र मिलने वाला ,स्वामी ,अमात्य ,राष्ट्रदुर्ग ,कोष, सेना तथा मित्र इन सातों या इनमें से कुछ रूपों में प्राप्त होता है |बल शरीर-सामर्थ्य का वाचक भी है |किन्तु यहां पर बल राज्यशक्ति से सम्बन्ध बल का पारिभाषिक नाम है |सच्चे मित्रों से मिलने वाले सत्य को ही मनुष्य को बलवान बनाने वाला मित्र बताया गया है |सत्य को अपनाकर असत्य का विरोध करते हुए विपन्न होने से डरना ,शक्तिमानों का स्वभाव होता है |


2-       सत्य या सच्चे मित्रों के बल से बलवान व्यक्ति अप्राप्त राज्येश्वर्य पाने के लिए भी सत्यानुमोदित प्रयत्न किया करे ,या किया जाना चाहिए |



   भावार्थ- सत्य बल से बलवान व्यक्ति अप्राप्त राज्येश्वर्य पाने के लिए भी उचित उधम उत्साह तथा अध्यवसाय से युक्त होकर रहे ,तब ही उसके बल का यथोचित उपयोग और विकास संभव है |सत्य के बल से बलवान व्यक्ति राजेश्वर्य पाने या उसे उत्पन्न करने व् उसे निरन्तर बढ़ाते रहने के लिए सत्यानुमोदित प्रयत्न करने पर ही प्राप्त कर सकते हैं |

Thursday, 19 September 2013

चाणक्य जी ने बताया कि कौन से व्यक्ति मित्र कहलाते है .

1-      विपत्ति के दिनों में जबकि सारा संसार विपदाग्रस्त को विपन्न होने के लिए अकेला छोड़ भागता है तब सहानुभूति रखने वाले व्यक्ति ही मित्र कहलाते हैं |



  भावार्थ- जो व्यक्ति विपन्न की विपत्ति को अपने ही ऊपर आई विपत्ति मन लेते हैं और आपातकाल में विपदग्रस्त का साथ देते हैं ,उन्ही को किसी से मित्रता का सम्बन्ध जोड़ने या किसी को अपना मित्र कहने का अधिकार होता है |इसके अतिरिक्त जो लोग आपत्ति के समय मित्रों को अकेला विपन्न होने के लिए छोड़ देते हैं |वह किसी के मित्र बनने या कहलाने के अधिकारी नहीं होते हैं |आने वाली विपदायें ही विपन्न को शत्रु-मित्र की पहचान कराती हैं और सच्चे मित्र से मिलने वाली सच्ची मैत्री बन जाती है |

चाणक्य जी ने बताया कि मन्त्र कौन-कौन से लोगो को ही पता होना चाहिए अगर किसी तीसरे व्यक्ति को पता चल जाता तो क्या होता है जाने .

1-      मन्त्र राजा तथा मुख्यमन्त्री के अतरिक्त किसी भी तीसरे व्यक्ति के कानों तक पहुंचते ही असार तथा ख़राब हो जाता है |



 भावार्थ- जब भी कोई मंत्रणा हो तो उसे केवल दो उत्तरदायी व्यक्तियों तक ही सीमित रहना चाहिए |राजा और महामंत्री अथवा महामंत्री और विभागीय मुख्य अधिकारी ,यही दो मिलाकर किसी कार्य की अंतिम रुपरेखा नियत करें |अपने विभागीय मन्त्रियों से मंत्रणा कर किसी कर ,किसी कर्तव्य का निर्णय करना महामंत्री का काम होने पर भी कार्य का अंतिम निर्णय राजा और महामंत्री करें |ये दोनों मन्त्र गोपनीयता के लिए उत्तरदायी हों |छह कानों अर्थात तीसरे किसी व्यक्ति के पास जाते ही मंत्रणा की गोपनीयता समाप्त हो जाया करती है |

Wednesday, 18 September 2013

चाणक्य जी ने बताया कि कौन-कौन से मंत्रणाकर्ताओ के एकमत हो जाने से कार्यसिद्दि निश्चित है.

1-      विचारणीय कर्तव्य के विषय में ऊपर बताये गये तीनो मंत्रणाकारों का एकमत हो जाना ,मंत्रण की सफलता है |इससे कार्यसिद्धि अवश्य होती है |



 भावार्थ- तीनों मंत्रणाकर्ताओं का एकमत्य हो जाना मन्त्र की श्रेष्ठता हो |उसका कार्यसिद्धि सुनश्चित हो जाती है |मंत्रणा ग्रहण करने वाला ,मंत्रणा देने वाला ,विश्वस्त ,हितैषी ,व्यवहार-कुशल मंत्री इन सबका एकमत होना लाभदायक और निश्चित लक्ष्य प्राप्ति का सुचल है |मंत्रणा को सफल बनाने के लिए सबको एकमत होना आवश्यक होता है| इसी से कार्यसिद्धि होती है |